Basic terminology of economic part 5

2111,2023

अर्थव्यवस्था के संबंध में महत्वपूर्ण शब्दावली

दोस्तों भारत की अर्थव्यवस्था में ज्यादातर शब्दों के मिनिंग से प्रश्न पूछा जाता है, यदि आपको शब्द का अर्थ पता है तो आगे के टॉपिक में कोई परेशानी नहीं होगी|

1.            मुद्रा ( money)

2.            पूँजी उत्पाद अनुपात (capital output ratio)

3.            कर(Tax), शुल्क(Duty) एवं फीस(Fees) में अंतर

आइये एक-एक Terminology को समझते है, जहाँ से सीधे आपके परीक्षा में प्रश्न पूछे जाते रहे है :-

1.            मुद्रा ( money) : -    मुद्रा विनिमय का एक माध्यम है जो कई रूप ले सकता है, जिसमें भौतिक मुद्रा, सिक्के, बैंक जमा और क्रिप्टोकरेंसी जैसी डिजिटल मुद्राएं शामिल हैं।

⇒मुद्रा की प्राथमिक कार्य : -

(a)          विनिमय का माध्यम(Medium of exchange) : - धन का उपयोग वस्तुओं और सेवाओं के आदान-प्रदान के साधन के रूप में किया जाता है। इसका मतलब यह है कि लोग बिना वस्तु विनिमय की आवश्यकता के वस्तुओं और सेवाओं को खरीदने के लिए पैसे का उपयोग कर सकते हैं।

(b)          सर्वग्राह्यता(universal acceptability) : - मुद्रा वह पदार्थ है जिसे जनसामान्य द्वारा लेन-देन के रूप में स्वीकार किया जाता है तथा जिसे सरकारी मान्यता प्राप्त होती है।

⇒मुद्रा की द्वितीयक कार्य :-

(a)          मूल्य संग्राहक(Store of value) : - पैसा लोगों को भविष्य के लिए बचत करने और निवेश करने की अनुमति देता है। पैसा बचाया जा सकता है और बाद में सामान और सेवाओं को खरीदने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।

(b)          मूल्य का मानक(standard of value) : - मूल्य का एक मानक अमेरिकी डॉलर या सोना जैसे विनिमय माध्यम में लेनदेन के लिए एक सहमत मूल्य है।

  • मूल्य के मानक के बिना, वस्तुओं के आदान- प्रदान के अन्य तरीके उत्पन्न हो सकते हैं, जैसे वस्तु विनिमय प्रणाली।
  • मूल्य के एक मानक की आवश्यकता है ताकि वस्तुओं और सेवाओं का मूल्य लगातार निर्धारित किया जा सके।

(c) मूल्य की इकाई(Unit of value) : -  पैसा वस्तुओं और सेवाओं के मूल्य का एक सामान्य माप प्रदान करता है। इससे विभिन्न वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों की तुलना करना और क्या खरीदना है इसके बारे में निर्णय लेना आसान हो जाता है।

मुद्रा के प्रकार- मुद्रा को कई आधारों पर कई वर्गों में बाँटा जा सकता है। यहां पर हम मुद्रा की भौतिक स्थिति एवं मांग के आधार पर मुद्रा का वर्गीकरण बता रहें हैं-

  1. Dear Money : -  डियर मनी से तात्पर्य उच्च ब्याज दर तथा कठोर शर्त पर उधार प्राप्त होना
  • जब केंद्रीय बैंक सख्त मौद्रिक नीति लागू करते हैं, तो ब्याज दरें बढ़ जाती हैं, जिससे बचत को बढ़ावा मिलता है और उधार या निवेश को हतोत्साहित किया जाता है।
  • इस प्रकार की मौद्रिक नीति अक्सर बढ़ती अर्थव्यवस्था को ठंडा करने और मुद्रास्फीति के दबाव से लड़ने के लिए लागू की जाती है।

⇒डियर मनी का प्रभाव : -  जब पैसा उच्च ब्याज दर पर प्राप्त होगा तो उधारियां महंगा होगा जिससे लोग बैंक से उधार कम लेंगे परिणामतः उद्योग में निवेश कम होगा जिससे औद्योगीकरण कम, औद्योगीकरण कम तो रोजगार का सृजन कम जिससे गरीबी में वृद्धि हो सकती है |

  1. Cheap Money : -  चिप मनी का तात्पर्य कम ब्याजदर तथा आसान शर्त पर उधार प्राप्त होना

 

⇒ चिप मनी का प्रभाव : जब पैसा कम ब्याज दर पर प्राप्त होगा तो उधारियां सस्ता होगा जिससे लोग बैंक से उधार ज्यादा लेंगे परिणामतः उद्योग में निवेश ज्यादा होगा जिससे औद्योगीकरण ज्यादा, औद्योगीकरण ज्यादा तो रोजगार का सृजन ज्यादा जिससे गरीबी में कमी हो सकती है |

  1. Hot Money : -  ऐसी मुद्रा, जो ब्याजदर में परिवर्तन से एक स्थान से दुसरे स्थान स्थानांतरित हो जाय|
  • हॉट मनी वह पूंजी है जिसे निवेशक उच्चतम अल्पकालिक ब्याज दरों से लाभ प्राप्त करने के लिए नियमित रूप से अर्थव्यवस्थाओं और वित्तीय बाजारों के बीच स्थानांतरित करते हैं।
  • बैंक औसत से अधिक दरों पर जमा के अल्पकालिक प्रमाण पत्र प्रदान करके अर्थव्यवस्था में गर्म पैसा लाते हैं।
  • चीनी अर्थव्यवस्था एक गर्म मुद्रा बाजार का उदाहरण है जो निवेशकों के पलायन के बाद ठंडा हो गया|
  1. Hard Money : -  ऐसी मुद्रा जो कठिनाई से प्राप्त हो तथा विनिमय के समय मूल्य में हरास कम होता है |

जैसे – विदेशी मुद्रा

  1. धात्विक मुद्रा : - इसमें सभी सिक्के आते हैं।
  2. कागजी मुद्रा : - सभी नोट आते हैं।
  3. प्लास्टिक मुद्रा : - क्रेडिट एवं डेबिट कार्ड आते हैं।
  4. बुरी मुद्रा : - इसमें सभी कटे फटे नोट आते हैं।
  5. अच्छी मुद्रा : - इसके अंतर्गत नये नोट आते हैं।

अर्थव्यवस्था में तरलता (Liquidity) - अर्थव्यवस्था में तरलता दो प्रकार से हो सकती है

  1. बाजार की तरलता - किसी भी समय अर्थव्यवस्था में उपलब्ध मुद्रा की कुल मात्रा को तरलता कहा जाता है। यदि तरलता अधिक है तो मुद्रास्फीति की स्थित उत्पन्न हो सकती हैं जबकि तरलता कम होने की स्थिति में अपस्फीति या मंदी आ सकती है।
  2. मुद्रा की तरलता मुद्रा की तरलता से संदर्भ मुद्रा के व्यय होने में लगने वाले समय से है। यदि समय कम लग रहा है तो वह मुद्रा अधिक तरल है। उदाहरण के लिए यदि एक व्यक्ति के पास नगद, क्रेडिट कार्ड एवं सोने के रूप में परिसंपत्तियां (मुद्रा) उपलब्ध हैं तो नगद सबसे अधिक तरल (क्योंकि नगद सबसे जल्दी और आसानी से खर्ची जा सकती है), क्रेडिट कार्ड कुछ कम तरल और सोने की तरलता सबसे कम मानी जाएगी।

⇒मुद्रा का मापन : - किसी भी समय अर्थव्यवस्था में कुल मुद्रा को मापने के लिए केन्द्रीय बैंक कुछ मापक का प्रयोग करते हैं। भारत के संदर्भ में रिजर्व बैंक द्वारा 1977 में एक वर्क फोर्स का गठन किया गया, जिसके द्वारा बाजार में किसी समय पर कितनी मुद्रा उपलब्ध है, मापने के लिए 4 मापक तय किये गए जिन्हें M1, M2, M3 एवं M4 नाम से जाना जाता है।

  1. M 1 = CU (Coins and Currency) + DD (Demand and Deposit)

        CU अर्थात लोगों के पास उपलब्ध नगद (नोट एवं सिक्के), DD अर्थात व्यावसायिक बैंकों के पास कुल निवल जमा एवं रिजर्व बैंक के पास अन्य जमाये। निवल शब्द से बैंक के द्वारा रखी गयी लोगों की जमा का ही बोध होता है और इसलिए यह मुद्रा की पूर्ति में शामिल हैं। अंतर बैंक जमा, जो एक व्यावसायिक बैंक दूसरे व्यावसायिक बैंक में रखते हैं, को मुद्रा की पूर्ति के भाग के रूप में नहीं जाना जाता है।

  1. M 2 = M1 + डाकघर बचत बैंकों की बचत जमांए
  2. M3= M1 + बैंक की सावधि जमाये (FD)
  3. M 4=M3+ डाकघर बचत संस्थाओं में कुल जमा राशि (राष्ट्रीय बचत प्रमाण पत्रों को छोड़कर)

   M1 से M4 की तरफ जाने पर मुद्रा की तरलता घटती है, परन्तु बाजार की तरलता बढ़ती जाती है।

                            M1>M2>M3>M4

संकुचित मुद्रा (Narrow Money)= M1 को संकुचित मुद्रा भी कहते है क्योंकि मात्रा में ये अन्य सभी से सबसे कम होती है, अर्थात इसमें पैसा सबसे कम होता है।

वृहद/बड़ी मुद्रा (Broad Money)= M3 को वृहद मुद्रा कहते है। सामान्यतः वृहद मुद्रा M4 को होना चाहिए परन्तु M1 से M4 तक जाते जाते उसे प्रयोग करना कठिन हो जाता है। इसे ऐसे भी कह सकते हैं कि उसकी (M4) की तरलता इतनी कम है कि उसे प्रयोग नहीं किया जा सकता अतः M3 को ही वृहद मुद्रा कहा जाता है।

 अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा का मूल्य निर्धारण

  1. बाजार द्वारा मुद्रा का मूल्य निर्धारण - अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में किसी देश की मुद्रा की मांग के आधार पर उसके मूल्य का निर्धारण किया जाता है। इसे प्रवाही विनिमय दर (Floating exchange rate) कहते हैं। प्रवाही इसलिए क्योंकि यह दर कम ज्यादा होते रहती है। किसी भी देश की मुद्रा का मूल्य निरपेक्ष (अकेले) नहीं होता वो हमेशा दूसरी मुद्रा के सापेक्ष होता है, अर्थात एक देश की मुद्रा की दूसरे देश के मुद्रा के साथ तुलना की जाती है इसे विनिमय दर (Exchange rate) कहते हैं। जैसे – 1$ = 83.34
  2. सरकार द्वारा मुद्रा का मूल्य निर्धारण - कभी-कभी सरकारें भी जानबूझकर अपने देश की मुद्रा का मूल्य कम या ज्यादा कर देती है। ऐसा उस देश की आर्थिक स्थिति को ध्यान में रखकर किया जाता है

1. अधिमूल्यन (Overvaluation) – मुद्रा का मूल्य बढ़ाना

2. अवमूल्यन (Devaluation)- मुद्रा का मूल्य घटाना     

अवमूल्यन (Devaluation) करने की स्थितियां –

1. जब किसी देश की सरकार के पास विदेशी मुद्रा की कमी हो जाती है तो वो जानबूझकर अपनी मुद्रा का मूल्य घटाकर (अवमूल्यन) कर विदेशी मुद्रा को संग्रहित करती है।

2. जब किसी देश को निर्यात बढ़ाना हो और आयात घटाना हो, तब भी मुद्रा का अवमूल्यन किया जाता है। इस अवधारणा को अर्थशशास्त्रियों ने j वक्र कहा है।

 

02:44 am | Admin


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