Worlds Famous Dussehra of Bastar

1510,2023

बस्तर का दशहरा 

बस्तर का दशहरा अपनी अभूतपूर्व परंपरा व संस्कृति की वजह से विश्व प्रसिद्ध है।। यह कोई आम पर्व नहीं है यह विश्व का सबसे लंबी अवधि तक चलने वाला पर्व है। छत्तीसगढ़ के बस्तर में मनाया जाने वाला दशहरा  75 दिन तक मनाया जाता है। बस्तरवासी वगभग 600 साल से यह पर्व मनाते आ रहे हैं।  बस्तर ही एकमात्र जगह है जहां दशहरे पर रावण का पुतला दहन नहीं किया जाता।  यह पर्व बस्तर की आराध्य देवी मां दंतेश्वरी की आराधना से जुड़ा हुआ है।

बस्तर के आदिवासियों की अभूतपूर्व भागीदारी का ही प्रतिफल है कि बस्तर दशहरा की राष्ट्रीय पहचान स्थापित हुई। प्रतिवर्ष दशहरा पर्व के लिए परगनिया माझी अपने अपने परगनों से सामग्री जुटाने का प्रयत्न करते थे। सामग्री जुटाने का काम दो तीन महीने पहले से होने लगता था। इसके लिए प्रत्येक तहसील का तहसीलदार सर्वप्रथम बिसाहा पैसा बाँट देता था, जिससे गाँव-गाँव से बकरे सुअर भैंसे चावल दाल तेल नमक मिर्च आदि बड़ी आसानी से जुटा लिए जाते थे। सामग्री के औपचारिक मूल्य को बिसाहा पैसा कहते थे। एकत्रिक सामग्री मंगनी चारडरदसराहा बोकड़ा कहलाती थी। सारी सहयोग सामग्री जगदलपुर स्थित कोठी के कोठिया को सौंप दी जाती थी।आज का बस्तर दशहरा पूर्णतः दंतेश्वरी का दशहरा है। बस्तर दशहरे की यह एक तंत्रीय पर्व प्रणाली आज के बदलते जीवन मूल्यों में भी दर्शकों को आकर्षित करती चल रही है। यह इसकी एक बड़ी बात है। कहना न होगा आज का जो बस्तर दशहरा हम देख रहे हैं। वह हमें अपने गौरवशाली अतीत से जोड़ता है। एक ऐसा अतीत जो बस्तर के आदिवासियों की अमूल्य धरोहर है ।।।।

एक अनुश्रुुति के अनुसार बस्तर नरेश भैराजदेव के पुत्र पुरुषोत्तम देव ने जगन्नाथपुरी तक पदयात्रा कर मंदिर में एक लाख स्वर्ण मुद्राएँ, स्वर्णाभूषण अर्पित की थी। स्वप्न में श्री जगन्नाथ ने राजा पुरुषोत्तम देव को रथपति घोषित करने के लिए पुजारी को आदेश दिया था।राजा पुरुषोत्तम देव जब पुरी धाम से बस्तर लौटे तभी से गोंचा और दशहरा पर्व पर रथ चलाने की प्रथा चल पड़ी। 75 दिनो तक दशहरा की इस लंबी अवधि में पाटजात्रा, काछन गादी, जोगी बिठाई, मावली परघाव, भीतर रैनी, बाहर रैनी तथा मुरिया दरबार मुख्य रस्में होती  हैं। 

इस पर्व का आरंभ वर्षाकाल के श्रावण मास की हरेली अमावस्या से होता है। रथ निर्माण के लिए प्रथम लकड़़ी  का पट्ट विधिवत काटकर जंगल से लाया जाता है, इसे पाट जात्रा विधान कहा जाता है। पट्ट पूजा से पर्व के महाविधान शुरू होता है।बिलोरी के ग्रामवासी सिरहासार भवन में डेरी लाकर भूमि में स्थापित करते हैं। स्तंभ रोहण की इस परंपरा को डेरी गड़ाई कहते है। इस रस्म के बाद रथ निर्माण के लिए विभिन्न गांवों से लकडिय़ां लाकर कार्य शुरू किया जाता है।

                         काछिनगादी

बस्तर दशहरा का प्रथम चरण है। काछनगादी का अर्थ होता है काछिन देवी को गद्दी देना। काछिनदेवी की गद्दी होती है काँटों की। काछिन देवी रणदेवी भी कहलाती हैं।  काछिनदेवी बस्तर के मिरगान आदिवासियों की कुलदेवी है। अश्विन मास की अमावस्या के दिन काछिनगादी का कार्यक्रम आयोजित होता है। रथ परिक्रमा प्रारंभ करने से पहले काछनगुड़ी में कुंवारी हरिजन कन्या को कांटे के झूले में बिठाकर झूलाते हैं तथा उससे दशहरा की अनुमति व सहमति ली जाती है।
इस कार्यक्रम के लिए राजा अथवा राजा का प्रतिनिधि संध्या समय धूमधाम के साथ जुलूस लेकर जगदलपुर के पथरागुड़ा मार्ग पर स्थित काछिनगादी में पहुँच जाता था।  मान्यता के अनुसार काछिन देवी धन-धान्य की वृद्धि एवं रक्षा करती हैं। देवी के आगमन पर झूले पर सुलाकर उसे झुलाते हैं। फिर देवी की पूजा अर्चना की जाती है और उससे दशहरा मनाने की स्वीकृति प्राप्त की जाती है। काछिन देवी से स्वीकृति सूचक प्रसाद मिलने के पश्चात बस्तर का पारंपरिक दशहरा समारोह बड़ी धूमधाम के साथ प्रारंभ हो जाता है।

                      जोगी बिठाई

आश्विन शुक्ल प्रथमा से बस्तर दशहरा नवरात्रि कार्यक्रम दंतेश्वरी देवी की पूजा से शुरू हो जाता है।
इसी दिन सिरहासार में प्राचीन टाउन हॉल में जोगी बिठाई की रस्म होती है। जोगी बिठाने के लिए सिरहासार के मध्य भाग में एक आदमी के बैठने लायक एक गड्ढा बनाया जाता है। इसके अंदर हलबा जाति का एक व्यक्ति लगातार नौ दिन योगासन में बैठा रहता है। इस दौरान वह मल-मूत्र का भी त्याग नहीं करता है। जोगी बिठाई से पहले एक बकरा और 7 मांगुर मछली काटने का रिवाज था। अब बकरा नहीं काटा जाता मांगुर माछ ही काटे जाते हैं। कहा जाता है कि पहले कभी दशहरे के अवसर पर एक कोई वनवासी दशहरा निर्विघ्न संपन्न होने की कामना लेकर अपने ढंग से योग साधना में बैठ गया था। तभी से बस्तर दशहरा के अंतर्गत जोगी बिठाने की प्रथा चल पड़ी है।  जोगी इस बीच फलाहार तथा दुग्धाहार में रहता है। 

                       रथ परिक्रमा

जोगी बिठाई के दूसरे दिन से फूल रथ चलना शुरू हो जाता है। 
चार पहिए वाला यह रथ पुष्प सज्जा प्रधान होने के कारण फूलरथ कहलाता है। इस रथ पर आरुढ होने वाले राजा के सिर पर फूलों की पगड़ी बँधी होती थी। उनके साथ देवी दंतेश्वरी का छत्र आरुढ़ रहता है। साथ में देवी का पुजारी रहता है। प्रतिदिन शाम एक निश्चित मार्ग पर रथ परिक्रमा करता हुआ राजमहल के सिंहद्वार के सामने खड़ा हो जाता है।
रथ के साथ गांव-गांव से से आमंत्रित देवी देवता भी चलते है।  दुर्गाष्टमी को निशाजात्रा होता है। निशाजात्रा का जलूस नगर के इतवारी बाज़ार से लगे पूजा मंडप तक पहुँचता है।
  पहले-पहले 12  पहियों वाला एक विशाल रथ किसी तरह चलाया जाता था। परंतु चलाने में असुविधा होने के कारण एक रथ को आठ और चार पहियों वाले दो रथों में विभाजित कर दिया गया। क्योंकि जन श्रुति है कि राजा पुरुषोत्तम देव को जगन्नाथ जी ने बारह पहियों वाले रथ का वरदान दिया था। 

आज भी लोग श्रद्धा भक्ति से प्रेरित होकर रथों की रस्सियाँ खींचते हैं। रथ के साथ-साथ नाच गाने भी चलते रहते हैं। मुंडा लोगों के मुंडा बाजे बज रहे होते हैं। लोक-नृत्य धमाधम चल रहा होता है|| पहले बस्तर दशहरा में इस रथयात्रा के दौरान हल्बा सैनिकों का वरचस्व रहता था। आज भी उनकी भूमिका उतनी ही जीवंत एवं महत्त्वपूर्ण है। 

                  जोगी उठाई मावली पर घाव

मावली पर घाव का अर्थ है देवी की स्थापना। अश्विन शुक्ल नवमीं की शाम सिरासार में समाधिस्थ जोगी को समारोह पूर्वक उठाया जाता है। जोगी को भेंट देकर सम्मानित करते हैं। इसी दिन रात में मावली परघाव होता है। दंतेवाड़ा से श्रद्धापूर्वक दंतेश्वरी की डोली में लाई गई मावली मूर्ति का स्वागत किया जाता है। मावली देवी को दंतेश्वरी का ही रूप मानते हैं।नए कपड़े में चंदन का लेप देकर एक मूर्ति बनाई जाती है। उस मूर्ति को पुष्पाच्छादित कर दिया जाता है। मावली माता निमंत्रण पाकर दशहरा पर्व में सम्मिलित होने जगदलपुर पहुँचती हैं।  इनकी डोली को राजा, राजगुरु और पुजारी कंधे देकर दंतेश्वरी मंदिर तक पहुँचाते हैं।।

                    विजयादशमी भीतर रैनी

विजयादशमी के दिन भीतर रैनी तथा एकादशी के दिन बाहर रैनी होता है। दोनों दिन आठ पहियों वाला विशाल रथ चलता है। भीतर रैनी के दिन यह रथ अपने पूर्ववर्ती रथ की ही दिशा में अग्रसर होता है। इस रथ पर झूले की व्यवस्था रहती है।
विजयदशमी की शाम को रथ के समक्ष एक भैंस की बलि दी जाती थी लेकिन अब यह परंपरा खत्म हो चुकी है। भैंस को महिषासुर का प्रतीक माना जाता था। विजयादशमी के रथ की परिक्रमा जब पूरी हो जाती है तो आदिवासी आठ पहियों वाले इस रथ को प्रथा के अनुसार चुराकर कुम्हड़ाकोट ले जाते हैं।

                          बाहिर रैनी

राजमहल से  दूर कुम्हड़ाकोट में बाहर रैनी के दिन राजा देवी को नया अन्न अर्पित कर प्रसाद ग्रहण करते हैं। बाहिर रैनी का झूलेदार रथ कुम्हड़ाकोट से चलकर  सिंह द्वार तक पहुंचता है। 
बस्तर दशहरे की शाभा यात्रा में कई ऐसे दृश्य हैं जिनके अपने अलग-अलग आकर्षण हैं और जनसे पर्याप्त लोकरंजन हो जाता है।  

                         मुरिया दरबार

दशहरा संपन्न होने पर काछिनगुड़ी के पासवाले पूजामंडप में काछिन देवी को सम्मानित किया जाता है। शाम को सीरासार में  ग्रामीण तथा शहर के मुखियों की एक मिली जुली आमसभा होती है।इसमें विभिन्न परगनाओं के मांझी-मुखिया विभिन्न समस्याओं के निराकरण पर खुली चर्चा करते हैं। इस सभा को मुरिया दरबार कहते हैं। इसी के साथ गांव-गांव से आए देवी-देवताओं की विदाई हो जाती है।
 बस्तर दशहरे का यह एक सार्थक कार्यक्रम था। वैसे आदिवासी दरबार आज भी चल रहा है। इसी के साथ गाँव-गाँव से आए देवी देवताओं की विदाई हो जाती है। 

                          ओहाड़ी

अंत में प्रातः गंगा मुणा स्थित मावली शिविर के निकट बने पूजा मंडप पर मावली माई के विदा सम्मान में गंगा मुणा जात्रा संपन्न होती है। इस कार्यक्रम को ओहाड़ी कहते हैं। पहले बस्तर दशहरा के विभिन्न जात्रा कार्यक्रमों में सैकड़ों पशुमुंड कटते थे जात्रा का अर्थ होता है यात्रा अर्थात महायात्रा (बलि)। बस्तर अंचल  शक्तिपूजकोंका अंचल है। पर आज यह प्रथा बंद-सी हो गई है।

Published By DeshRaj Agrawal 

#Bastar #dussehera

08:39 am | Admin


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