Union And It's Territory

0512,2023

भाग 1

          संघ और उसका राज्यक्षेत्र

इस भाग में कुल 4 अनुच्छेद है |

अनुच्छेद 1. संघ का नाम और राज्यक्षेत्र -

अनुच्छेद 1(1) भारत, अर्थात् इंडिया, राज्यों का संघ होगा ।

स्पष्टीकरण  इस अनुच्छेद से 2 बातें इंगित होती है, एक देश का नाम और दूसरा शासन का स्वरुप –

  • देश का नाम : - हम्रारे देश के 2 अधिकारिक नाम है एक भारत और दूसरा इण्डिया | याद रहे भारत का अंग्रेजी हस्तांतरित इण्डिया नहीं होता दोनों ही अलग-अलग नाम है|
  • शासन का स्वरुप : -  राज्यों का संघ(union) होगा अर्थात केंद्र और विभिन्न राज्यों के बीच संबंध को प्रदर्शित करता है, इसका अभिप्राय है की भारत संघ किसी समझौते का परिणाम नहीं है तथा कोई भी राज्य भारत से अलग नहीं हो सकता |
  • सीधे शब्दों में कहूँ तो भारत विनाशी राज्यों का अविनाशी संघ है ||

अनुछेद 1(2) राज्य और उनके राज्यक्षेत्र वे होंगे जो पहली अनुसूची में विनिर्दिष्ट हैं ।

स्पष्टीकरण – इस अनुच्छेद से यह इंगित होता है की भारत के 28 राज्यों तथा 8 केंद्र शासित प्रदेश की सूची अनुसूची 1 में लिखा गया है |

अनुछेद 1(3) भारत के राज्यक्षेत्र में –

  • राज्यों के राज्यक्षेत्र,
  • पहली अनुसूची में विनिर्दिष्ट संघ राज्यक्षेत्र, और
  • ऐसे अन्य राज्यक्षेत्र जो अर्जित किए जाएं, समाविष्ट होंगे ।

स्पष्टीकरण – भारत राज्यों का संघ और भारत के राज्यक्षेत्र दोनों में अंतर है  -

  • भारत राज्यों का संघ : -  यह सीमित अवधारणा है, जिसमे केवल भारत के राज्य शामिल है| राज्यों की संख्या 28 है |
  • भारत के राज्यक्षेत्र : -  यह व्यापक अवधारणा है जिसमे भारत के सभी राज्यों , संघ शासित प्रदेश तथा भारत द्वारा अर्जित किए गए क्षेत्र शामिल है|

जिसमे राज्यों की संख्या 28 है |

संघ शासित प्रदेशों की संख्या 8 है |

तथा अर्जित क्षेत्रों की संख्या 0 है|

अनुच्छेद 2 नए राज्यों का प्रवेश या स्थापना - संसद्, विधि द्वारा, ऐसे निर्बधनों और शर्तों पर, जो वह ठीक समझे, संघ में नए राज्यों का प्रवेश या उनकी स्थापना कर सकेगी ।

स्पष्टीकरण – भारत संघ में कोई नया प्रदेश( जो पहले से भारत संघ का हिस्सा नहीं है) को शामिल करना हो तो उसकी प्रक्रिया का उल्लेख है| संसद विधि बनाकर ऐसा कर सकती है चाहे तो कुछ निर्बन्धन और शर्त जैसे संधि, उपहार,लीज , व्यापर एवं वाणिज्य जो संसद ठीक समझे रख सकती है, लेकिन संसद कोई ऐसा निर्बन्धन और शर्त नहीं रखेगी जो मूलभूत ढांचा को प्रभावित करता हो|

मुख्य रूप से इस अनुच्छेद के दो निहितार्थ हैं

  • पहला कि संसद को ये शक्ति दी गई है कि वे नये राज्यों का भारतीय संघ में प्रवेश (Admit) करा सकती है। लेकिन इस शक्ति के तहत उसी राज्य को भारत में प्रवेश कराया जा सकता है जो पहले से अस्तित्व में है।
  • दूसरा संसद नये राज्यों का गठन (Establish) कर सकती है। लेकिन इस शक्ति के तहत उस राज्य को भारत में प्रवेश कराया जा सकता है जो पहले से अस्तित्व में नहीं है।
  • कुल मिलाकर अनुच्छेद 2 उन राज्यों के भारत में प्रवेश एवं गठन से संबन्धित है जो भारतीय संघ का हिस्सा नहीं है। अगर टेक्निकली देखें तो संघ (Union) में केवल राज्य आते हैं, और क्षेत्र (Territory) में राज्य, UTs और अन्य क्षेत्र भी आते हैं। इस हिसाब से अगर किसी UT को भारतीय संघ का राज्य बनाया जाए तो यह अनुच्छेद 2 के तहत हो सकता है।
  • इसे दूसरे उदाहरण से इस तरह से भी समझ सकते हैं कि जब भारत द्वारा किसी क्षेत्र को अधिगृहीत किया जाएगा तब वो भारतीय राज्यक्षेत्र (Territory) का हिस्सा तो बन जाएगा लेकिन उसे संघ में शामिल कराना होगा, तभी वो भारतीय संघ का हिस्सा बनेगा। और यह काम केवल संसद ही अधिनियमन द्वारा कर सकती है।
  • याद रखें, अनुच्छेद 2 भारतीय संघ में नए राज्यों के प्रवेश की अनुमति देता है, जबकि अनुच्छेद 3 भारत संघ के भीतर नए राज्यों के गठन या मौजूदा राज्यों की सीमाओं, क्षेत्रों या नामों में परिवर्तन की अनुमति देता है। कहने का अर्थ ये है कि अनुच्छेद 2 के तहत भारतीय संघ का भौगोलिक विस्तार हो सकता है।

•उदाहरण के लिए सिक्किम को लें सकते हैं यह भारतीय संघ का हिस्सा नहीं था, इसे 1975 में भारतीय संघ में प्रवेश कराया गया।

सिक्किम को 35वा संविधान संशोधन द्वार अनुच्छेद 2A जोड़कर सहयोगी राज्य बनाया गया

फिर 35वा संविधान संशोधन द्वारा सिक्किम को पूर्ण राज्य का दर्जा दे दिया गया तथा अनुच्छेद 2A को हटा दिया गया |

अनुच्छेद 3 नए राज्यों का निर्माण और वर्तमान राज्यों के क्षेत्रों, सीमाओं या नामों में परिवर्तन - संसद्, विधि द्वारा ये पाँच चीजें कर सकती है –

(क) किसी राज्य में से उसका राज्यक्षेत्र अलग करके अथवा दो या अधिक राज्यों को या राज्यों के भागों को मिलाकर अथवा किसी राज्यक्षेत्र को किसी राज्य के भाग के साथ मिलाकर नए राज्य का निर्माण कर सकेगी;

(ख) किसी राज्य का क्षेत्र बढ़ा सकेगी;

(ग) किसी राज्य का क्षेत्र घटा सकेगी;

(घ) किसी राज्य की सीमाओं में परिवर्तन कर सकेगी;

(ङ) किसी राज्य के नाम में परिवर्तन कर सकेगी :

स्पष्टीकरण – इस प्रकार संसद किसी भी राज्य का क्षेत्रफल बढ़ा या घटा सकती है या किसी राज्य की सीमाओं या नामों में परिवर्तन कर सकती है। संसद इस संबंध में निम्नलिखित प्रक्रियाओं का पालन करती है।

चरण-1: संसद का कोई भी सदन, केवल राष्ट्रपति की सिफारिश पर, ऊपर बताए गए किसी भी या सभी परिवर्तनों को प्रभावी करने वाला विधेयक पेश कर सकता है।

चरण-2: यदि ऐसा कोई विधेयक किसी राज्य की सीमा या नाम को प्रभावित करता है, तो राष्ट्रपति विधेयक को संसद में पेश करने से पहले संबंधित राज्य विधानमंडल को उनकी राय जानने के लिए भेजेंगे।

चरण-3: यदि राज्य विधानमंडल दी गई समय सीमा के भीतर कोई राय व्यक्त करने में विफल रहता है तो यह माना जाएगा कि उसने अपना विचार व्यक्त कर दिया है। संसद राज्य विधानमंडल के विचारों को स्वीकार करने या उन पर कार्य करने के लिए बाध्य नहीं है, भले ही राज्य ने समय अवधि के भीतर अपने विचार प्रस्तुत कर दिए हों।

 

अनुच्छेद 4 यदि अनुच्छेद 2 तथा अनुच्छेद 3 के पालन में संसद कोई विधि बनाती है तो इसे संविधान संशोधन नहीं माना जायेगा अर्थात यह अनुच्छेद 368 से बाहर होगा|

  • यह कार्य  साधारण बहुमत से हो जायेगा
  • इसके तहत अनुसूची 1 तथा अनुसूची 4 में संशोधन भी होगा |
  • संसद इसके पालन हेतु पूरक विधियाँ बना सकती है|

 

      

02:59 am | Admin


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